मंडी : जिला मुख्यालय से लगभग चालीस किलोमीटर दूर सराज विधानसभा क्षेत्र के एक छोटे से गाँव झनीरदार ने आज अपनी पारंपरिक पहचान को आधुनिक उद्यमिता के साथ जोड़कर राष्ट्रीय फलक पर एक अमिट छाप छोड़ी है, जहाँ कॉर्पोरेट जगत की चकाचौंध को त्यागकर अपनी जड़ों की ओर लौटी एक जीआईएस इंजीनियर प्रवीण वर्मा ने ‘पहाड़न’स गिल्ड प्राइवेट लिमिटेड’ के माध्यम से न केवल एक स्टार्टअप खड़ा किया है,
बल्कि “पहाड़न का गांव” बसाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पुनरुद्धार की एक नई इबारत लिख दी है, जो हिमाचल प्रदेश की उन दुर्गम चोटियों और घाटियों में छिपी प्रतिभा को एक सशक्त मंच प्रदान करने का परिणाम है जहाँ प्रवीण ने महसूस किया कि ऊन की काताई, बुनाई और हस्तशिल्प में निपुण ग्रामीण महिलाओं का कौशल उचित बाज़ार और संगठन के अभाव में दम तोड़ रहा था,
जिसे पुनर्जीवित करने के लिए उन्होंने ‘स्लो टूरिज़्म’ और ‘टेक्सटाइल टूरिज़्म’ के एक ऐसे अभिनव मॉडल की नींव रखी जो पर्यटकों को केवल प्राकृतिक सौंदर्य ही नहीं दिखाता, बल्कि उन्हें स्थानीय जीवनशैली, खानपान और पारंपरिक आजीविका के साधनों का जीवंत अनुभव भी प्रदान करता है और इसी विजन के साथ “पहाड़न’स विलेज” के नाम से विख्यात यह गंतव्य आज देशभर के उन सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है जो पाँच सितारा होटलों की विलासिता के बजाय चरखे पर धागा कातने, कच्चे ऊन की प्रोसेसिंग सीखने और पारंपरिक करघों पर बुनाई की बारीकियों को समझने में रुचि रखते हैं, जिससे स्थानीय महिलाओं को अपने घर की चौखट के भीतर ही सम्मानजनक आय और वैश्विक पहचान प्राप्त हो रही है, जहाँ ‘खेत से कपड़े तक’ के सिद्धांत पर आधारित इस पहल ने बिचौलियों की भूमिका को समाप्त कर सीधे मुनाफे को उन शिल्पकार महिलाओं के हाथों में पहुँचाया है जिनकी उंगलियाँ इन धागों में हिमाचल की संस्कृति पिरोती हैं और इसी पारदर्शी व प्राकृतिक दृष्टिकोण के कारण वर्ष 2026 इस स्टार्टअप के लिए उपलब्धियों का वर्ष सिद्ध हुआ है, जिसमें पहाड़न’स गिल्ड को ‘नेशनल स्टार्टअप अवॉर्ड 2026’ में भारत के शीर्ष छह स्टार्टअप्स में स्थान प्राप्त होने के साथ-साथ कपड़ा मंत्रालय की विशेष सराहना और टाइम्स ऑफ इंडिया समूह द्वारा प्रवीण वर्मा को “पावर इंस्पायरिंग कम्युनिटी बिल्डर” के रूप में ‘पावर क्रिएटर अवॉर्ड 2026’ से नवाजा गया है, जिससे झनीरदार गाँव की यह सफलता आज आत्मनिर्भर भारत और ‘वोकल फॉर लोकल’ के संकल्प को धरातल पर उतारने का एक उत्कृष्ट उदाहरण बन चुकी है, जहाँ पहले केवल घरेलू कार्यों तक सीमित रहने वाली महिलाएं आज कुशल प्रशिक्षक और सफल उद्यमी के रूप में उभरकर ग्रामीण युवाओं के पलायन को रोकने में मददगार साबित हो रही हैं और प्रवीण वर्मा का यह विजन अब सराज घाटी की सीमाओं को लांघकर हिमाचल के अन्य दुर्गम क्षेत्रों तक विस्तार की योजना बना रहा है ताकि आधुनिक इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि और पारंपरिक लोक ज्ञान के इस अनूठे संगम से देवभूमि की हर बेटी के हुनर को आर्थिक स्वावलंबन और सामाजिक प्रतिष्ठा की नई रोशनी मिल सके जो अंततः न केवल लुप्त होती कलाओं का संरक्षण करेगा बल्कि एक ऐसी सुदृढ़ ग्रामीण अर्थव्यवस्था का निर्माण करेगा जो अपनी मिट्टी और संस्कृति पर गर्व करते हुए वैश्विक बाज़ारों में अपनी गुणवत्ता का लोहा मनवा सके, और इस यात्रा की गहराई को समझें तो यह केवल एक व्यापारिक मॉडल नहीं बल्कि एक सामाजिक क्रांति है जिसने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि तकनीकी ज्ञान का उपयोग अपनी जड़ों को सींचने के लिए किया जाए तो पहाड़ों का पानी और पहाड़ों की जवानी दोनों को वहीं रोका जा सकता है, जहाँ ग्रामीण परिवेश की शांति और शहरी बाजार की मांग के बीच एक ऐसा सेतु निर्मित हुआ है जो भविष्य के टिकाऊ पर्यटन की आधारशिला बनेगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए विरासत के संरक्षण का मार्ग प्रशस्त करेगा, जिससे न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होगी बल्कि वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर हिमाचल प्रदेश एक “अनुभवात्मक पर्यटन” के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित होगा, जहाँ हर पर्यटक एक याद के साथ-साथ एक शिल्पकार के संघर्ष और उसकी विजय की कहानी भी अपने साथ लेकर जाएगा, जो वास्तव में नए भारत की वह तस्वीर है जहाँ प्रगति और परंपरा साथ-साथ चलते हैं और जहाँ तकनीक का उद्देश्य केवल लाभ कमाना नहीं बल्कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़ी महिला के जीवन में उजाला लाना है।
