मंडी- कोटली महाविद्यालय केवल एक भवन नहीं, बल्कि 66 गांवों के हजारों युवाओं और बेटियों के सपनों का केंद्र है। जब आप शिक्षा के दीप ही बुझा देंगे, तो विकास की रोशनी कहाँ से आएगी? शिक्षा का दीपक बुझाकर विकास की मशाल नहीं जलाई जा सकती। इसलिए कोटली कॉलेज को बंद नहीं, बल्कि सशक्त और आधुनिक बनाना समय की आवश्यकता है। 2, जून 2026 की अधिसूचना के अनुसार राज्य सरकार ने कम नामांकन वाले 9 सरकारी कॉलेजों के विलय/बंदी का निर्णय लिया था, जिनमें कोटली कॉलेज भी शामिल है।
•बाद में भारी जनदबाव और जनप्रतिनिधियों की आपत्तियों के बाद सरकार ने तीन कॉलेजों को राहत दी, जिससे स्पष्ट है कि निर्णय पर पुनर्विचार संभव है।
प्रो. अनुपमा सिंह ने प्रश्न उठाया कि यदि वर्ष 2016 में कोटली महाविद्यालय की स्थापना क्षेत्र की आवश्यकता को देखते हुए की गई थी, तो मात्र दस वर्षों में ऐसी कौन-सी परिस्थितियाँ बदल गईं कि अब उसकी आवश्यकता ही समाप्त मान ली गई है?
उन्होंने कहा कि 66 गांवों की आबादी न तो समाप्त हुई है और न ही युवाओं की संख्या में कोई ऐसी असाधारण कमी आई है, जिससे उच्च शिक्षा की आवश्यकता खत्म हो गई हो। वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि कॉलेज की आवश्यकता कम हुई है, बल्कि यह है कि क्या महाविद्यालय को समय के साथ विद्यार्थियों की बदलती जरूरतों के अनुरूप विकसित किया गया।
उन्होंने कहा कि यदि छात्र संख्या में कमी आई है तो इसके कारणों की समीक्षा होनी चाहिए। आज का युवा केवल डिग्री नहीं, बल्कि रोजगार और कौशल चाहता है। इसलिए महाविद्यालय में पर्यटन एवं आतिथ्य प्रबंधन, डिजिटल मार्केटिंग, ई-कॉमर्स, सूचना प्रौद्योगिकी, ऑनलाइन उद्यमिता, स्टार्टअप प्रबंधन, कौशल विकास, कृषि एवं बागवानी आधारित कार्यक्रम, हेल्थ केयर तथा अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रम आरंभ किए जा सकते हैं। सायंकालीन सत्रों में कुछ पेशेवर पाठ्यक्रम भी चलाए जा सकते हैं, जिससे स्थानीय युवाओं को अतिरिक्त अवसर प्राप्त होंगे।
उन्होंने कहा कि यदि छात्र संख्या कम है तो सरकार को यह भी देखना चाहिए कि पिछले वर्षों में नामांकन बढ़ाने, नए विषय शुरू करने, रोजगारोन्मुखी कार्यक्रम जोड़ने तथा बुनियादी सुविधाएं विकसित करने के लिए क्या प्रयास किए गए। केवल छात्र संख्या के आधार पर किसी संस्थान का भविष्य निर्धारित करना उचित नहीं है।
प्रो. सिंह ने प्रदेश सरकार से आग्रह किया कि कोटली महाविद्यालय को बंद करने के निर्णय पर पुनर्विचार किया जाए, शेष निर्माण राशि तत्काल जारी की जाए, भवन का निर्माण कार्य पूरा किया जाए तथा इस महाविद्यालय को एक मॉडल ग्रामीण उच्च शिक्षण संस्थान के रूप में विकसित किया जाए।
उन्होंने कहा कि विकसित भारत और विकसित हिमाचल का सपना तभी साकार होगा जब गांवों और दूरदराज़ क्षेत्रों के युवाओं को उनके घर के निकट गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा उपलब्ध होगी।
उन्होंने कहा—जब आप शिक्षा के दीप ही बुझा देंगे, तो विकास की रोशनी कहाँ से आएगी? कॉलेजों के दरवाज़े बंद करके किसी प्रदेश का भविष्य नहीं संवारा जा सकता। शिक्षा का दीपक बुझाकर विकास की मशाल नहीं जलाई जा सकती। कोटली कॉलेज केवल एक भवन नहीं, बल्कि हजारों युवाओं के सपनों का उजाला है।
प्रो. अनुपमा सिंह ने कहा कि कोटली महाविद्यालय वर्तमान में विद्यालय भवन में संचालित हो रहा है, जो उच्च शिक्षा के लिए दीर्घकालिक समाधान नहीं है। सबसे पहली आवश्यकता यह है कि महाविद्यालय के अधूरे भवन का निर्माण शीघ्र पूरा किया जाए और उसे उसके अपने परिसर में स्थानांतरित किया जाए। वर्षों से क्षेत्र की जनता अपने महाविद्यालय के स्थायी भवन की प्रतीक्षा कर रही है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद भवन का उपयोग न होना दुर्भाग्यपूर्ण है। सरकार को शेष लगभग 2 करोड़ रुपये की राशि जारी कर निर्माण कार्य पूरा करवाना चाहिए ताकि महाविद्यालय को स्कूल भवन से उसके स्वतंत्र परिसर में स्थानांतरित किया जा सके। इससे न केवल विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिलेगा बल्कि विद्यालय और महाविद्यालय दोनों की व्यवस्थाएं भी सुचारु रूप से संचालित हो सकेंगी। सरकार का तर्क है कि कम छात्र संख्या वाले संस्थानों में संसाधनों का बेहतर उपयोग और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया गया है।
प्रो. सिंह ने यह भी सुझाव दिया कि स्ववित्तपोषित (Self-Financing) पाठ्यक्रमों तथा सायंकालीन व्यावसायिक कार्यक्रमों को अनुमति दी जाए ताकि महाविद्यालय अपनी आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित कर सके और युवाओं को स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा सके।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों के विद्यार्थियों तक उच्च शिक्षा पहुंचाने, कौशल विकास को बढ़ावा देने तथा शिक्षा के अवसरों का विस्तार करने की बात करती है। ऐसे समय में महाविद्यालयों को बंद करने के बजाय उन्हें आधुनिक, बहुविषयक और रोजगारोन्मुखी संस्थानों के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
प्रो. अनुपमा सिंह ने प्रदेश सरकार से कोटली महाविद्यालय को बंद करने के निर्णय पर पुनर्विचार करने, शेष निर्माण राशि जारी करने तथा महाविद्यालय को एक मॉडल ग्रामीण उच्च शिक्षण संस्थान के रूप में विकसित करने की मांग की।
जहां शिक्षा के दीप जलते हैं, वहीं विकास की किरणें पहुंचती हैं। शिक्षा के दीप बुझाकर विकास की रोशनी नहीं फैलाई जा सकती।”
