गुरुवार को ऋषि पराशर जी का खारा जिसमें पराशर जी प्रतिमाएं होती है कोठी /भण्डार बांधी से रियासत कल से चली आ रही परम्परा के अनुसार मूल स्थान जहां पराशर जी की प्राकृतिक झील है सुबह आठ बजे अपने लाव लश्कर और बाध्य यंत्र ,छड़ियां,छत्र इत्यादि इत्यादि के साथ रवाना हुए जब खारा भंडार के प्रांगण मैं आया उस समय हजारों की संख्या मैं श्रद्धालुगण और आश पास के पराशर जी की हरियान और गांव वासियों ने बड़े जोर शोर से स्वागत किया और अपने हाथ मैं लिए हुए फूल इत्यादि खरे के ऊपर अर्पण किए यह देखने का बहुत अच्छा नज़ारा था और संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। खारे को भंडार मैं जब तैयार किया जा रहा था उसमें प्रधान बलबीर ठाकुर भंडारी अमर सिंह,तीर्थ राज और अन्य पुजारी और देवता की समिति के सभी व्यक्ति मौजूद रहे। इस त्यौहार को काशी पर्व का त्यौहार माना जाता है। इसमें श्री देव चन्डोही जी के कारदार गोबिंद राम भी मौजूद थे। बलवीर ठाकुर,तीर्थ राज ठाकुर और गोबिंद राम ने बताया कि सभी गांव वासी इस त्यौहार मैं बढ़ चढ़ कर भाग लेते है और जो नई फसल होती है उसको गांव वासी अपने खेतों से निकाल कर जिसका नाम काशी है जिसको देवता जी के मूल स्थान मैं दूसरे दिन सुबह अर्पित करते है। उन फसल के दानों का विधि अनुसार देवता को भोग लगाया जाता है और सभी गांववासी और अन्य श्रद्धालुओं को जो वहा मौजूद होते है उसका भगवान का प्रसाद आवंटित किया जाता है। देवता के खारा निकलने के समय सर्व देवता सेवा समिति जिला मण्डी के अध्यक्ष शिव पाल शर्मा और प्रेस सचिव मनोज कुमार ने भी देवता के कोठी मैं मस्तक झुकाया और आशीर्वाद लिया। इस पर इन्होंने कहा कि रियासत काल की परम्परा को संजोए रखना बहुत अचछी बात है और इससे देव संस्कृति जीवित रहती है।
